ग्वालियर के पास मुरैना जिले में बटेश्वर मंदिर समूह 6 वीं से 9 वीं शताब्दी के बीच बने 208 मंदिरों का ऐसा भव्य समूह है, जो देखने वालों को हैरत में डाल देता है। मंदिरों की एक झलक मिलते ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति के कैनवास पर किसी कुशल चित्रकार ने खूबसूरत पेंटिंग बना दी हो। मंदिरों का शिल्प, वास्तुकला और इतनी बडी संख्या में उनकी मौजूदगी ही यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि अतीत में यह एक बडा तीर्थ स्थल रहा होगा, जिसमें जगह-जगह जलकुण्ड भी थे। यहां पहुंचने के लिए ग्वालियर या फिर मुरैना शहर से आना होगा। ग्वालियर से यहां की दूरी 35 किमी और मुरैना से 30 किमी है, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए साधनां का अभाव है। बेहतर होगा कि यहां या तो अपने वाहनों से ही पहुंचें, या फिर ग्वालियर-मुरैना से टैक्सी, ऑटो ले लें। बाइक से भी यहां खूब आना-जाना होता है, सडक अच्छी है, मार्ग में कोई परेशानी नहीं, लेकिन समयानुकूल परिवहन के लिए कोई नियमित साधन नहीं है। हम भी ग्वालियर से बाइक द्वारा यहां पहुंचे, बाइक चालक निरंजन कुशवाह भी उत्साही युवा थे, उन्हें मंदिरों को घुमाने में भी खूब आनंद आ रहा था, उत्साह से वे खुद आगे बढ जाते और मुझे भी बुला लेते। फोटो लेने और वीडियो बनाने में भी उन्होंने मेरा सहयोग किया। शनिचरा में प्राचीन षनिदेव मंदिर में दर्षन के बाद यहां पहुंचे तो मंदिरों का यह समूह देखकर आंखें फटी रह गईं। षिल्प के नायाब नमूनों के इतने विशाल मंदिर समूहों की हमने कल्पना भी नहीं की थी।
करीब 25 एकड क्षेत्र में फैले इन मंदिरों का निर्माण उत्तरवर्ती गुप्त काल और प्रतिहारकाल में हुआ है। मंदिरों का ये समूह शिव-शक्ति और विष्णु भगवान को समर्पित है। अधिकांश मंदिरों के प्रवेश द्वार पर नवग्रह, गंगा-यमुना, दिग्पाल और खासतौर पर भगवान विष्णु के दसावतारों और सप्तमातृकाओं का अंकन दिखाई देता है। कहीं-कहीं पर शिवलिंग की पूजा-आराधना करते भक्तों का शिल्पांकन है। वायुदेव, अग्निदेव, यमदेव सहित अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मंदिर के बाहर दीवारों पर नजर आती हैं। गणेशजी अनेक मुद्राओं में मौजूद हैं। जगह-जगह शिवलिंगों की मौजूदगी के साथ ही यहां पंचभूत महादेव के रूप में एक वेदी पर पांच शिवलिंग भी मौजूद हैं। इनमें से महादेव का एक पूजित मंदिर है, जिसकी छत अंदर से भी अलंकृत है, लेकिन मंदिर सपाट बना है। गर्भग्रह के द्वार पर गंगा-यमुना जल कलश लिए दिखाई देती हैं, जो मंदिर में प्रवेश से पूर्व पवित्रता की द्योतक हैं। गर्भग्रह में भव्य शिवलिंग मौजूद है और द्वार के दोनों ओर आराधना मुद्रा में दो भक्तों को दिखाया गया है। गर्भग्रह के बाहर नंदी हैं और नंदी के पीछे एक चबूतरा है, जिस पर शिला रखी है।
मंदिर समूहों और पास ही दो पवित्र जलकुंडों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अतीत में यह स्थान कितना बडा तीर्थस्थल रहा होगा, एक ऐसा स्थान जहां दो-चार नहीं बल्कि 200 से अधिक देवालयों की मौजूदगी होगी; जलकुंडों में स्नान कर श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजा के लिए आते होंगे। लेकिन अतीत में प्राकृतिक आपदाओं और समयचक्र के चलते यह मंदिर समूह बीहड और मिट्टी के ढेर में तब्दील हो गया। मंदिरों का समूह पत्थरों और मिट्टी के मलबे में मिल गया, महादेव मंदिर जैसे चंद मंदिर यहां मौजूद रहे होंगे, जिसमें चंबल के दस्यु आकर पूजा-अर्चना करते थे और यहां शरण भी लेते थे। लेकिन सदियों तक मलबे और समय की गर्त में दब चुका यह तीर्थक्षेत्र 2005 में पुरातत्वविद् केके मोहम्मद और उनकी टीम के प्रयासों से यह मंदिर समूह जैसे फिर अस्तित्व में आकर अपने शिल्प से देश-दुनियां को आश्चर्यचकित करने के लिए उठ खडा हुआ।
मंदिरों को फिर सामने लाने की जद्दोजहद शूरू हुई, ढह चुके मंदिरों के शिखरों को फिर संवारा जाने लगा। मलबे में दब चुके चबूतरों को साफ किया गया और धीरे-धीरे सार्थक प्रयासों का सुफल सामने आया। अत्यंत भव्य मंदिरों का यह समूह अब फिर दुनियां के सामने अपने शिल्प का लोहा मनवाने के लिए मौजूद है। जैसे हर मंदिर शिव-शक्ति और भगवान विष्णु के गुणगान करता प्रतीत होता है। यकीनन यह स्थान जहां पुरातत्व और इतिहास की नजर से बेहद महत्वपूण्र है, वहीं यह पर्यटनप्रेमियों को भी खूब भाने वाली जगह है, प्रकृति के बीच इतिहास और शिल्प का संगम देखना हो तो यहां जरूर आएं।




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