ग्वालियर में विख्यात हैं भेलसे वाली माता

ग्वालियर के बोडहापुरा क्षेत्र में जनकताल के पास देवी का एक प्राचीन मंदिर है, जो तुलजा भवानी का है, इसमें महिषासुरमर्दिनी की भव्य प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा भेलसा यानी मप्र के विदिशा नगर से लाई जाने के कारण भेलसे वाली माता के नाम से ही विख्यात है और मंदिर का नाम भी भेलसे वाली माता मंदिर ही है। करीब 177 साल प्राचीन इस मंदिर में काले पत्थर से बनी देवी माता की अत्यंत भव्य प्रतिमा विराजमान है, यह प्रतिमा अष्टभुजी है, जिनमें अलग-अलग आयुध हैं, देवी एक हाथ से महिषासुर का सिर पकडे हुए हैं और त्रिशूल से उसका वध कर रही हैं। देवी का श्रंगार पूरी तरह महाराष्ट्यिन शैली का होता है। देवी की यह प्रतिमा एक उंची वेदी पर स्थापित है, देवी के गर्भग्रह के सामने कच्छप की प्रतिमा जमीन पर उत्कीर्ण है, जबकि विशाल मंडप के बाहर देवी के ठीक सामने की ओर काले पत्थर की ही बनी गणेश जी की प्रतिमा सहित शिवलिंग और नंदी की प्रतिमाएं विराजमान हैं। इन्हीं प्रतिमाओं के आसपास महाराष्ट्यिन शैली के दीप स्तंभ मौजूद हैं, जिन पर दीप मालिकाएं सजाई जाती थीं। 

 भेलसे वाली माता का मंदिर

मंदिर के पुजारी पं अजय भेलसे वाले बताते हैं कि हम सात पीढी से इस मंदिर की सेवा में हैं। हमारे पूर्वज गोविंद राव विट्ठलराव सिंधिया राजवंश के सेनापति थे, उन्हें सिंधिया राजवंश ने ‘‘शमशेर जंग बहादुर‘‘ की उपाधि दी थी। विदिशा का नाम उस समय भेलसा था, सेनापति गोविंद राव जी भेलसा के किले से यह प्रतिमा ग्वालियर लाए थे, उस समये ग्वालियर के महाराज जयाजीराव सिंधिया की आज्ञा से गोविंदराव जी ने ही संवत् 1905 में यहां इस प्रतिमा की स्थापना कराई थी, भेलसा की प्रतिमा होने के कारण इस मंदिर को भेलसे वाली माता ही कहा जाता है। मंदिर के प्रवेष द्वार पर एक बीजक भी लगा है, जिसमें प्रतिमा की स्थापना और उसके समय का जिक्र है। यह मंदिर एक चढाई पर मौजूद है, मंदिर पहुंचने के लिए सीढियां बनी हुईं है, इनके शुरूआत में ही दो सिंहों की प्रतिमाएं बना दी गई हैं। लेकिन देखरेख के अभाव में यह अब काफी जीर्ण शीर्ण होता जा रहा है। देखरेख के अभाव में पास ही बने जनकताल का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है।

Post a Comment

Previous Post Next Post