उत्तर भारत का सोमनाथ भोजपुर का शिवालय

उत्तर भारत के सोमनाथ के रूप में विख्यात भोजपुर के शिवालय जहां अपने विशाल शिवलिंग के लिए जाना जाता है। मन में काफी दिनों से भगवान भोलेनाथ के इस शिवालय जाने की इच्छा थी, अपना वाहन लेकर चल दिए शिवजी का बुलावा जानकर। भोपाल से करीब 25 किमी दूर पहुंचते ही मार्ग से ही एक पहाडी पर शिवालय के दर्शन होते हैं, लेकिन दूर से ही मंदिर अधूरा सा प्रतीत होने के बाद आकर्षित करता है, जैसे-जैसे पास पहुंचते गए शिवालय की भव्यता अधीर करती गई कि कैसे जल्दी महादेव के दर्शन को पहुंच जाएं। फिर शिवालय परिसर से करीब 100 मीटर पहले अपनी गाडी पार्क की और पैदल ही चल दिए महादेव के दर्शन को। सडक के दोनों ओर फूल-माला, प्रसादी और पूजन सामग्री की कई दुकानें लगी थीं और दुकानदार पूजा सामग्री, फूल-प्रसादी आदि का आग्रह कर रहे थे। एक टोकरी में प्रसादी और फूल आदि लेकर हमने भी शिवालय के परिसर को प्रणाम किया और प्रवेश कर गए शिवधाम में। चौतरफा चट्टानों का दृश्य ही था और उसमें चोटी पर मौजूद था बाबा शिव का धाम। 


मंदिर का निर्माण अपूर्ण दिखता है, और इसे लेकर दो जनश्रुतियां हैं, पहली यह कि कुंती ने शिव साधना के लिए मंदिर बनवाने की इच्छा जताई थी, इस पर पांडवों ने रातों रात मंदिर बनवाने का संकल्प लिया था, लेकिन इसकी छत पूरी नहीं हो सकी और सुबह हो गई, इस कारण ये छत कभी पूरी नहीं हो सकी। वहीं दूसरे जनश्रुति के अनुसार राजा भोज ने यहां 11 वी शताब्दी में यह मंदिर बनवाया और फिर उन्हीं के नाम पर इसे भोजेश्वर महादेव नाम दिया गया।

सीढियों को प्रणाम करके मंदिर के चबूतरे पर चढने से पहले ही एक बडा सा लेख पत्थर पर दिखता है, जिसमें मंदिर निर्माण के बारे में पौराणिक और ऐतिहासिक दो कथाएं अंकित दिखती हैं। पहली कथा अथवा जनश्रुति के अनुसार कुंती ने पांडवों के अज्ञातवास के दौरान अपने पुत्रों से शिव उपासना के लिए मंदिर की इच्छा व्यक्त की थी, पांडवों ने रातों रात मंदिर बनवाने अथवा भोर होने से पहले ही मंदिर निर्माण कराने का संकल्प लिया था, लेकिन सूर्योदय के पहले मंदिर की छत नहीं बन सकी जिससे मंदिर अधूरा रह गया। यह भी जनश्रुति है कि इसी मंदिर के पास कहीं बेतवा की धारा में कुंती ने अपने पुत्र कर्ण को छोडा था। वहीं ऐतिहासिक प्रमाण और जनश्रुति के अनुसार यह मंदिर परमार राजा भोजदेव ने 11 वीं शताब्दी में बनवाया था, उन्होंने यहां एक बांध भी बनवाया था जो टूट चुका है। यहां राजा भोज ने परिसर में और भी कई मंदिरों के निर्माण की योजना बनाई थी लेकिन वह पूरी नहीं हो सकी, इसका प्रमाण मंदिर के सामने षिलाओं पर उत्कीर्ण मंदिर की कार्ययोजना से मिलता है।


परमार राजा भोजदेव द्वारा 11 वीं शताब्दी मेंं बनवाए गए इस मंदिर का इतिहास और विवरण विस्तार से अंकित है, पहली बार आने वाले दर्शनार्थियों और पर्यटकों को यह जरूर पढना चाहिए क्योंकि इससे मंदिर को समझने में आसानी होती है। इसी शिलालेख के बाजू में अलग से एक सती स्तंभ बना हुआ है। सीढियां के नीचे ही एक तय स्थान पर जूते-चप्पल उतारकर हम सीढियों पर अपना कदम रखते हैं और चंद सीढियों के बाद हम विशाल चबूतरे पर आते हैं, दूर से ही मंदिर के गर्भग्रह में विराजित विशाल शिवलिंग के दर्शन हमें आस्था, श्रद्धा और रोमांच से भर देते हैं, स्वतः ही जय शिव...जय शिव के स्वर मुंह से निकलने लगते हैं। फिर शिवालय के द्वार पर पहुंचते हैं तो द्वार के दोनों ओर कुबेर, शैव, द्वारपाल और परिचारिकाओं सहित गंगा-यमुना की प्रतिमाएं दिखती हैं। शिवजी और शिवगणों की प्रतिमाओं के भी यहां दर्शन होते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार पश्चिम मुखी यह मंदिर 106 फीट लम्बा, 77 फीट चौडा और 17 फीट उंचे चबूतरे पर निर्मित है। इसके गर्भग्रह की अपूर्ण छत 40 फीट उंचे चार स्तंभों और 12 अर्धस्तंभों पर टिकी है। यहां भोलेनाथ के विशाल शिवलिंग के दर्शन कर मन रोमांचित हो उठता है, सीढियों पर खडे होकर ही पूर्ण दर्शन हो पाते हैं। मंदिर के पुजारी ही नसेनी यानी सीढी लगाकर ऊचे शिवलिंग पर पहुंचकर उसका श्रंगार करते हैं बाकी श्रद्धालु नीचे से ही फूल माला, बेलपत्र, प्रसादी अर्पित करते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यहां योनिपटट सहित 22 विश्व के सबसे उंचे शिवलिंग में शुमार गर्भग्रह में भी कुछ कलात्मक स्तंभ और कुछ प्रतिमाएं मौजूद हैं। भोलेनाथ के दर्शन और आराधना कर बाहर निकलते हैं तो मन शिव आस्था से भरपूर और प्रफुल्लित रहता है, बाहर आकर गर्भग्रह के सामने छतरी नुमा चबूतरे पर मौजूद शिवलिंग को जलादि अर्पित किए जाते हैं और यहां से हम फिर भोलेनाथ के विशाल शिवलिंग के दर्शन करते हैं। मंदिर में दाईं ओर का दृश्य देखने निकलते हैं तो पत्थरों का एक ढेर दिखाई देता है जो मंदिर में शिल्प के दौरान एकत्रित हुआ होगा, जिसका ढेर वहां जमा कर लगा दिया गया, यही से मंदिर के शिवलिंग की पूजा और मंदिर के गर्भग्रह का जलनिकासी द्वार है, जो मकरद्वार के रूप में शिल्प से अलंकृत किया गया है। मंदिर के दर्शन कर लौटते समय मंदिर के ठीक सामने पडा शिलाओं का ढेर और विशाल परिसर भी आकर्षित करता है। दरअसल इस पत्थर में ही मंदिर का पूरा रहस्य और मंदिर निर्माण की योजना मौजूद है। यहां विशाल परिसर की चट्टानों पर कई नक्शे अंकित है, संभवतः ये मंदिर निर्माण की योजना का हिस्सा रहे होंगे। पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय के अनुसार मंदिर की दीवारों तथा आसपास की चट्टानों पर राजमिस्त्रियों के 1300 चिन्ह और 50 से ज्यादा राजमिस्त्रियों के नाम मौजूद हैं। मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों का उपयोग भी यहीं पास की पत्थर खदानों से लिया जाता था, जिनके काटे जाने के निशान अब भी मौजूद हैं। पुरातत्वविद केके मोहम्मद का अनुमान है कि-‘मंदिर की छत संभवतः निर्माण काल में ही भार सहने का सही आंकलन न हो पाने और वास्तु दोष के कारण गिर गई होगी, इसके बाद संभवतः राजा भोज ने मंदिर के पुर्ननिर्माण का विचार त्याग दिया होगा। '


मंदिर के पूर्व तथा उत्तर की ओर चट्टानों की सतह पर विभिन्न मंदिरों की शैली में भू विन्यास, स्तंभ, मेहराबों, शिखर आदि के रेखांकन या नक्शे जैसी संरचनाएं मौजूद हैं जो यहां की वास्तुकला के साथ ही यह भी प्रदर्शित करती हैं कि इस स्थान पर मौजूद शिवालय के अलावा भी यहां अन्य कई मंदिरों के निर्माण की योजना थी, लेकिन वह पूरी नहीं हो सकी। भोजेश्वर महादेव के इस विख्यात मंदिर के दर्शन के बाद पास ही पार्वती गुफा के नाम से मौजूद एक गुफा के दर्शन होते हैं जहां प्राचीन महत्व की अनेक प्रतिमाएं मौजूद हैं। इसे भी भोजपुर के इसी शिव मंदिर के समकालीन माना जाता है। पास ही दिगम्बर जैन समाज का अतिशय क्षेत्र है जो श्री शान्तिनाथ जिनालय के नाम से है, यहां भक्तामर स्त्रोत के रचियता आचार्य मानतुंग की समाधि और प्राचीन मंदिर है जिसमें भगवान शांतिनाथ, पार्श्वनाथ और सुपार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमाएं मौजूद हैं। भोजपुर के इस शिव मंदिर परिसर में महाशिवरात्रि और मकर संक्रांति पर यहां मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर दूर से लाखों श्रद्धालु भोलेनाथ के दर्शन करने पहुंचते हैं।

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