सवा सौ साल पुरानी रामलीला का आधुनिकता के साथ कदमताल



विदिशा. मध्यप्रदेश के विदिशा नगर में भारतीय संस्कृति और भगवान राम के चरित्र को दुनियां में बांटने और इससे नई पीढ़ी को जोड़े रखने का अनूठा अभियान चल रहा है। रामलीला के जरिए  यह अभियान 125 साल पहले शुरू हुआ था, जो आज भी अपने मूल स्वरूप को बरकरार रखते हुए आधुनिक तकनीक के सांमजस्य से निरंतर आगे बढ़ रहा है। विदिशा की इस अनूठी रामलीला मे 20 से ज्यादा परिवारों की तीन से चार पीढियां अभिनय कर रही हैं, लेकिन ये कोई प्रोफेशनल कलाकार नहीं हैं, बल्कि सिर्फ यहीं की रामलीला में पूरे समर्पण भाव से एक माह तक जुड़े रहकर अभिनय तथा सेवा करते हैं। विदिशा की यह रामलीला वेबसाइट के जरिए दुनियां के 20 से अधिक देशों में देखी जा रही है। यह मप्र की ऐसी अनूठी रामलीला है जो किसी मंच या हॉल में न होकर खुले मैदान, सडक़ों पर पूरी तरह चलित होती है। विदिशा में रामलीला की शुरूआत धर्माधिकारी पं विश्वनााथ शास्त्री ने 1900 में की थी, उस समय उन्होंने यह रामलीला अपने शिष्यों के सहयोग से 10 दिन की शुरू की थी, रामलीला के डॉयलॉग उन्होंने खुद तैयार किए थे, वही डॉयलॉग आज सवा सौ साल बाद भी बोले जाते हैं। इस रामलीला का अपना खुद का संविधान है, जिसे बनवाने में रामलीला के संस्थापक पं. विश्वनाथ शास्त्री के साथ ही मध्यभारत के मुख्यमंत्री रहे बाबू तखतमल जैन और विधानसभा के स्पीकर बाबू रामसहाय सक्सेना ने पूरा योगदान दिया था। विदिशा की इस रामलीला मेला समिति के मानसेवी सचिव और सदस्यों की नियुक्ति  मध्यप्रदेश शासन द्वारा की जाती है जिसकी अधिसूचना भी मप्र के राजपत्र में प्रकाशित होती है। विदिशा की रामलीला मेला समिति के अध्यक्ष खुद कलेक्टर होते हैं। देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकरदयाल शर्मा और मप्र के पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भी इसमें अभिनय कर चुके हैं। 

1900 में लिखे संवाद ही बोले जाते हैं...

युद्ध मैदान में रावण
रामलीला के प्रथम प्रधान संचालक पं. विश्नाथ शास्त्री ने खुद इस रामलीला के संवाद तैयार किए थे, उनके वंशज डॉ सुधांशु मिश्र बताते हैं कि पं विश्वनाथ शास्त्री जी संवाद बोलते जाते थे, जिन्हें उनके पुत्र पं. चंद्रशेखर शास्त्री बर्रू से लिपिबद्ध करते जाते थे। वही मूल संवाद तब से अब तक हमारे पास सुरक्षित हैं और उन्हीं संवादों तथा उनके द्वारा ही बताई गई बैठक व्यवस्था, युद्ध की शैली, पोषाकों के चयन और श्रंगार सामग्रियों का अब तक उपयोग हो रहा है। 

मशालों की रोशनी से हाईमास्ट तक का सफर

रामलीला में रावण के पुतले का दहन
रामलीला समिति के मौजूदा प्र्रधान संचालक पं चंद्रकिशोर शास्त्री बताते हैं कि जब विदिशा में रामलीला की शुरूआत हुई थी तब यहां लाइट नहीं थी, इसलिए मशालों की रोशनी में रामलीला की जाती थी, लेकिन लाइट आने के बाद अब पूरा परिसर रंगबिरंगी लाइट और हाईमास्ट लाइट से जगमगाता है। पहले यहां ऊबड़ खाबड़ टीले को साफ करके तम्बू लगाकर और घास फूस की कुटिया बनाकर रामलीला होती थी, लेकिन धीरे धीरे विशाल रामलीला परिसर, स्टेडियम और भव्य अयोध्या तथा लंका भवनों के माध्यम से रामलीला परिसर में करीब 5 हजार से ज्यादा लोगों के बैठने का इंतजाम है। आजादी के पहले यहा रामलीला के दौरान गांव-गांव से इतनी भीड़ आती थी कि पूरा कलेक्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक कार्यालय भी रामलीला परिसर के दोनों किनारों पर शिफ्ट कर दिए जाते थे। पूरा प्रशासन तंबूओं में से चलता था। 

तकनीक से जीवंत होती रामलीला

संजीवनी लेकर रोप वे के जरिए उड़ते हुए हनुमान
सवा सौ साल पहले भले ही विदिशा की रामलीला बहुत छोटे रूप में और मात्र दस दिन की होती हो, लेकिन वक्त की मांग और आधुनिक तकनीक के समावेश से यह अब और जीवंत हो गई है। सीता जन्म के समय जमीन के नीचे से सीता जी का प्रकट होना, हनुमान जी का रोप वे के माध्यम से उडते हुए संजीवनी बूटी लेने जाना और फिर पहाड़ उठाकर ले आना, गरूड जी का रोप वे से आना, हाइड्रोलिक कुर्सी के जरिए अंगद का आसन रावण के सिंहासन के बराबर 15 फीट का करना, राम सेतु के समय समुद्र का निर्माण और राम तथा शिव बारात का शहर के मुख्य मार्गों से करीब 3 किमी का सफर तय करना रामलीला को जीवंत कर देता है।

हर वर्ग का जुड़ाव

विदिशा की रामलीला में कोई प्रोफेशनल कलाकार नहीं  है। लेकिन इसमें सभी पात्र रामलीला को समर्पित लोग ही निभाते हैे। कई परिवार तो पीढियों से यह कार्य कर रहे हैं। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन और सीता की भूमिका केवल ब्राम्हण परिवार के 18 वर्ष तक की आयु के ही बच्चे निभाते हैं। ये सभी छात्र वर्ग से हैं, जबकि अन्य भूमिकाओं मेे डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, वकील, शिक्षक, नेता तथा समाजसेवी भी शामिल होते हैं। 

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