दोस्त मोहम्मद से बचने इसी तालाब में ली थी रानी कमलापति ने जल समाधि

     "ताल तो भोपाल ताल, बाकि सब तलैया, 

       रानी तो कमलापति, बाकि सब रनैया"

यह कहावत भोपाल में भोपाल के बडे तालाब की विषालता और रानी कमलापति के सौंदर्य के लिए आज भी प्रचलित है और इसे कहावत के रूप में खुद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने रानी कमलापति महल में लिखवा रखा है। 

भोपाल में अब भी छोटे तालाब के किनारे रानी कमलापति का महल और पूरे परिसर में कमला पार्क मौजूद है; अधिकांष लोग कमला पार्क में घूमकर लौट आते हैं, लेकिन इसके एक हिस्से में भोपाल की अंतिम गौंड रानी की यादें और जल जौहर का इतिहास अभी भी बुलाता सा प्रतीत होता है। यहां मौजूद रानी कमलापति के महल का बचा हुआ हिस्सा अब भी जैसे उस वक्त की याद दिलाता है जब दुष्मन दोस्त मोहम्मद के हाथों मेें खुद को सौंपने की बजाय रानी कमलापति ने जल समाधि लेना उचित समझा था, इसके लिए उन्होंने बडे तालाब से छोटे तालाब को जोडने वाली सुरंग का रास्ता खुलवाकर पानी भरने का रास्ता साफ किया और फिर अपनी अस्मिता बचाने के लिए जल समाधि ले ली।

इतिहास गवाह है कि रानी कमलापति भोपाल की अंतिम गौड महिला षासक और जल जौहर करने वाली अंतिम हिन्दू रानी थीं। किवदंतियों के अनुसार सोलहवीं षताब्दी मे रानी कमलापति का जन्म सलकनपुर रियासत में राजा कृपाल सिंह गौंड के महल में हुआ था, बचपन से ही कमल के समान सुंदर दिखने के कारण उनका नाम कमलापति रखा गया। बडे होते होते वे अध्ययन, घुडसवारी, मल्लयुद्ध और तीरकमान चलाने में माहिर हो गईं। उनके षौर्य और क्षमताओं को देखते हुए उनको सेनापति बनाया गया और अपनी रियासत की रक्षा का दायित्व राजा कृपालसिंह और राजकुमारी कमलापति ने संभाल लिया। 

उधर सोलहवीं सदी में ही गौड राजा राजा सूरजमल षाह ने भोपाल से 55 किमी दूर गिन्नोरगढ राज्य स्थापित किया जो 750  ग्रामों को जोडकर बनाया गय बेटे निजाम षाह, गौड राजाओं में सबसे पराक्रमी और मजबूत माने जाते थे, राजकुमारी कमलापति का विवाह निजाम षाह से हुआ, निजामषाह के सात रानियां थीं, कमलापति सातों में सबसे छोटी थीं, वे निजाम षाह को सबसे प्रिय थीं। भोपाल की उपरी झील के पास 1710 में गौड राजाओं ने ही बस्ती बसाई थी। तत्कालीन गौड राजाओं में निजाम षाह सबसे प्रभावषाली माने जाते थे। निजाम षाह ने रानी कमलापति के लिए एक खूबसूरत महल बनवाया, उनके एक पुत्र नबल षाह भी हुआ। कमलापति अपने पति राजा निजाम षाह के राजकाज में हाथ बंटाने के साथ ही वित्तीय व्यवस्था संभालने, गौड संस्कृति के विकास सहित अन्य कार्य भी संभालती थीं। राजा निजाम षाह का भतीजा आलम षाह बाडी रियासत का षासक था, उसकी नजर अपने चाचा की रियासत और रानी कमलापति पर थी, इसे लेकर दोनों में मतभेद थे, एक दिन आलम षाह ने छलपूर्वक निजाम ष्षाह के भोजन में जहर मिलाकर उसकी हत्या कर दी। निजाम षाह की मौत के बाद खुद को असुरक्षित समझकर रानी कमलापति अपने पुत्र नबल षाह के साथ गिन्नौरगढ से भोपाल के अपने महल में आकर रहने लगीं, लेकिन उनके मन में अपने पति की मौत का बदला लेने की भावना प्रबल थी, लेकिन सेना और धन के अभाव में वे विवष थीं। उसी दौरान मुगल सेना से निकाला गया दोस्त मोहम्मद खान भोपाल आया था और उसने अपना डेरा जगदीषपुर में डाल रखा था, भारी सेना देख रानी कमलापति के मन में दोस्त मोहम्मद की मदद से अपने पति की मौत का बदला लेने की मंषा को बल मिला, उधर दोस्त मोहम्मद खान की नजर भी रानी कमलापति और उसकी संपत्ति पर थी, इसलिए उसने रानी द्वारा भेजा गया मदद का प्रस्ताव मान लिया। दोस्त मोहम्मद खान की मदद से रानी कमलापति ने आलम षाह को हराकर अपने पति की हत्या का बदला ले लिया और उसकी रियासत को भी अपनी रियासत में मिला लिया, लेकिन वह वादे के अनुसार अपनी मदद के बदले दोस्त मोहम्मद खान को एक लाख अषर्फियां नहीं दे पाई, इस कारण रानी ने भोपाल के एक हिस्से को दोस्त मोहम्मद खान को दे दिया, जिससे वह खुष हो गया। लेकिन उसकी नजर तो पूरे भोपाल, उसकी सम्पत्ति तथा रानी कमलापति पर थी, इसकी भनक लगने पर रानी कमलापति बहुत नाराज हुईं और उन्होंने दोस्त मोहम्मद को चेतावनी भिजवाई। लेकिन चेतावनी के बदले दोस्त मोहम्मद खान ने रानी को आत्मसमर्पण करने अथवा युद्ध के लिए कहा। अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए रानी ने युद्ध चुना और कुंवर नबल षाह के नेतृत्व में सेना भेजकर अपने दो विष्वासपात्र सैनिकों को पराजय की स्थिति में मनुआभान की पहाडी से धुंए का संकेत करने को कहा, दोस्त मोहम्मद खान और कुंवर नबल षाह की सेना में भयानक युद्ध हुआ, लेकिन दोस्त मोहम्मद खान की सेना विजयी हुई और जिस जगह पर युद्ध हुआ वह पूरी जगह गौड सैनिकों के रक्त से लाल हो गई,

जिसे लाल घाटी कहा जाने लगा। उधर हार के बाद रानी के दोनों विष्वासपात्र सैनिक भागकर मनुआभान की टेकरी पर पहुंचे और वहां धुंआ करके रानी को संकेत दिया कि हमारी सेना हार गई है। दोस्त मोहम्मद खान विजय के बाद महल पर कब्जा करने भोपाल आएगा और ऐसे में रानी की अस्मिता और धन संपत्ति गलत हाथों में आ जाएगी, यही विचार कर रानी ने तत्काल अपने महल की खास धन संपत्ति को एकत्रित किया, महल के द्वार बंद कराए और बडे तालाब से छोटे तालाब को आने वाली सुरंग का रास्ता खुलवा दिया, जिससे बडे तालाब का पानी छोटे तालाब में आ गया और उसी में रानी ने महल के पिछले हिस्से में जल समाधि लेकर अपने आत्मसम्मान और अस्मिता की रक्षा के लिए जल जौहर कर लिया, नतीजा यह हुआ कि जब दोस्त मोहम्मद खान उत्साहित होकर रानी कमलापति के महल पहुंचा तो उसे न तो धन संपत्ति मिली और न ही रानी कमलापति। 

छोटे तालाब के किनारे रानी कमलापति के इस महल का कुछ हिस्सा अब भी सुरक्षित है, जो 18 वीं सदी की स्थापत्य कला का एक नमूना है। अब भी महल और तालाब के बीच की पिचिंग सुरक्षित है, महल के दूसरे ओर अब भी महल के कुछ हिस्से बचे हुए हैं जिनमें नीचे के कमरे, उनमें जाने के रास्ते दिखाई देते हैं, हालांकि सुरक्षा की दृष्टि से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वहां जाना प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन महल के मुख्य द्वार पर तोप की मौजूदगी और मूल महल के एक कक्ष में मानचित्रों तथा रेखाचित्रों के जरिए रानी कमलापति, तालाब और गौड राजवंष की गाथा अब भी काफी हद तक सहेजी हैै। रानी कमलापति का महल अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन राष्ट्ीय संरक्षित स्मारक है। सरकार ने छोटे तालाब और रानी कमलापति के इसी महल के पास उनकी विषाल प्रतिमा भी स्थापित कराई है, जो आज भी उस स्थान पर रानी के जल जौहर की प्रतीक है। इसके साथ ही हबीबगंज स्टेषन का नाम भी इस महान गौड रानी के नाम पर रानी कमलापति कर दिया गया है। 

वर्तमान में बडे तालाब और छोटे तालाब के बीच बने बांध या पाल के कारण ही संभवतः इस नगर का नाम भोपाल पडा है, यह तालाब परमारकालीन और राजा भोज के कार्यकाल में बना था। बता दें कि इसी बांध के उपर गौडकालीन रानी कमलापति महल, कमला पार्क तथा उसके सामने की मुख्य सडक मौजूद है। यह भी बता दें कि इस पाल या बांध में एक सुरंग भी है जो बडे तालाब से छोटे तालाब को जोडती है। यह बात रानी कमलापति महल स्मारक में खुद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण बताता है कि भोपाल का नाम संभवतः बडे तालाब के लिए निर्मित विषाल एवं प्राचीन पाल या बांध के नाम पर पडा। करीब एक हजार साल पहले परमार काल में संभवतः राजा भोज ने कोलांस नदी पर पानी रोककर एकत्रित करने की मंषा से यह पाल बनवाया था। उस काम में पाल निर्माण के लिए ऐसे स्थान का चुनाव किया जाता था जहां नदी के दोनों ओर स्थित पहाडियो के बीच का अंतराल सबसे कम हो। भोपाल में यह वही स्थान है। पाल बनाने के लिए दोनों पहाडियों को जोडते हुए मिट्टी की एक विषाल दीवार बनाई गई, इस दीवार को क्षरण से रोकने के लिए उसकी बाहरी सतह को पत्थरों से ढंका गया, इसमें हजारों पत्थर तराषकर प्रयोग किए गए, इन पत्थरों के बीच किसी तरह के गारे का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि इन बडे बडे पत्थरों को एक के उपर एक रखकर इस प्रकार जमाया गया कि एक दूसरे के भार तथा दबाव से संतुलित रहें। इस प्रकार से बांध के बन जाने के बाद नदी का पानी रूकने लगा और तालाब का रूप ग्रहण करने लगा। इसी तालाब को अब बडे तालाब के नाम से जाना जाता है। यह बांध 367 मीटर लम्बा है, जिसकी अधिकतम उंचाई 16 मीटर है, नीचे तल पर यह 165 मीटर तथा उपरी तल पर 125 मीटर चैडा है। बांध के पष्चिमी ओर बडा तालाब और पूर्वी ओर छोटा तालाब स्थित है। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लिखता है कि इस पाल या बांध में एक सुरंग है जो पाल के नीचे से बडे तालाब के अतिरिक्त पानी को छोटे तालाब की ओर निकालती है। यह सुुरंग 148 मीटर लंबी, एक मीटर चैडी और 2.60 मीटर उंची है। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार भोपाल की नवाब षाहजहां बेगम 1868-1901 ने अपनी पुस्तक ताजुल इकबाल में लिखा है कि-‘‘ गिन्नौर के षासक निजाम षाह की हत्या के उपरांत उनकी रानी कमलापति तथा पुत्र नबल षाह गिन्नौरगढ में असुरक्षित हो गए थे, तब रानी कमलापति ने सरदार दोस्त मोहम्मद खान को सहायता के लिए आमंत्रित किया। अति महत्वाकांक्षी दोस्त मोहम्मद, तीराह अफगानिस्तान का निवासी था, भारत आने के उपरांत उसने स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की मंषा से मध्य भारत की ओर कूच किया। रानी के आमंत्रण पर दोस्त मोहम्मद ने सेना को संगठित कर बाडी पर हमला किया और उसे जीत लिया।‘‘ इसके बाद सन् 1722 में सरदार दोस्त मोहम्मद ने गौंड षासित क्षेत्र गिन्नौरगढ, जगदीषपुर तथा भोपाल और उसके आसपास के क्षेत्र जो गौंड षासन के तहत आते थे, पर अधिकार कर नए राजवंष की नींव रखी।

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